Sunday, May 2, 2010


कच्चे धागे !!!
मैंने बांधे थे कुछ कमजोर धागे
वक़्त के एक पेड़ पर
जहा गर्मियों मे बचपन मे
हम तुम खेला करते थे
तुम भाग कर तितली
बन जाया करती थी
और मे चाह कर भी
फूल न बन पता!
हमारी शादी पर मुझे अभी
याद हे उस पेड़ के डाली
ने दी थी वेदी पर गवाही!
स्तुति को अक्सर तुम बताती की
पेड़ के बंधे धागे के छोर से
निकल के वो आई हे
जब भी लडती मुझसे तुम
यही कहा करती वो पेड़ के
धागा हे जो मुझे तुमसे दूर
जाने नहीं देता!!

5 comments:

मनोज कुमार said...

अच्छा प्रयास।

दिलीप said...

bahut khoob...

नीला आसमान said...

@manoj and Dilip ji thanks a ton!

shubhanchi nigam said...

Awesome lines मे चाह कर भी फूल न बन पता!

Udan Tashtari said...

बहुत बेहतरीन भाव!